Yoga

अष्टांग योग Ashtanga Yoga In Hindi

अष्टांग योग 

योग साधना के अष्टांग योग हैः यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि।

यमः

यम के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य तथा अपरिग्रह आते हैं।

मन, वचन, कर्म से किसी भी प्राणि को किसी भी प्रकार का दुःख न पहुंचाने को “अहिंसा कहा जाता है जिसके अन्तर्गत ईर्ष्या, द्वेष तथादुर्वचनों का परित्याग आदि आता है। जो भी प्राणी अहिंसक बन जाता है, संसार के सभी जीव यहां तक कि हिंसक पशु भी उससे प्रेम करने लगते हैं।

मन वचन एवं कर्म से सत्य का पालन करने तथा हर परिस्थिति में सत्य बोलने से वाणी सिध्द हो जाती है।

किसी भी वस्तु को स्वयं पाने की अनाधिकार चेष्टा न करना ही “अस्तेय कहलाता है। अस्तेय के अन्तर्गत रिश्वत, चोरी, ठगी, पराई वस्तु को अपनी बताना, कम तौलना आदि आते हैं।

मन. वचन तथा कर्म से सभी प्रकार के मैथुनों का परित्याग करना “ब्रम्हचर्य कहलाता है। ब्रम्हचर्य के पालन से अतुलनीय शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है।

किसी प्रकार की सम्पत्ति का संचय न करना तथा उससे बचना ही “अपरिग्रह कहलाता है। अपरिग्रह से जन्म- जन्मान्तरों का ज्ञान होता है। अपरिग्रह के अन्तर्गत मोह, ममता, स्वार्थपरता आदि आते हैं।

नियमः

नियम के अन्तर्गत शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, तथा ईश्वर प्राणिधान आते हैं।

सभी प्रकार की बाह्य एवं अभ्यान्तरिक पवित्रता शौच कहलाती है। बाह्य स्वच्छता में स्नान, स्वच्छ वस्त्र धारण करना, दन्त धावन आदि आते हैं जिससे शरीर स्वच्छ तथा प्रसन्न रहता है। आन्तरिक स्वच्छता में ईर्ष्या, क्रोध, नफरत, मोह, लोभ, मद आदि आते हैं। मन की शुध्दि, एकाग्रता, चित्त शुध्दि, जितेन्द्रियता तथा आत्म साक्षात्कार की योग्यता को आभ्यान्तर शौच मान गयै है। शौच मानव शरीर को स्वस्थ, चित्त को निर्मल एवं विचारों को पवित्र बनाकर ईश्वर सामीप्य लाभ कराने में सहायक होता है।

हर परिस्थिति में खुश रहना सन्तोष कहलाता है। सुख-दुख, हानि-लाभ आदि किसी भी कारण से असन्तुष्ट न होना एवं कामनाओं पर विजय पाना सन्तोष का मुख्य लक्षण है।

कष्ट-सहिष्णुता ही तप है। सर्दी-गर्मी,मान-अपमान, भूख-प्यास आदि को समान भाव से सहन करते हुए ईश्वर के चिन्तन में मन लगाना तप कहलाता है। तप से सभी इन्द्रियों का असाधारण विकास होता है एवं सभी प्रकार की सिध्दियां सुलभ हो जाती है।

वेद, वेदान्त, सदगुण तथा आध्यात्म के पोषक एवं दुर्गुणों से हटाने वाले वेद, पुराण, शास्त्र आदि का अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है। स्वाध्याय से ही ईष्टदेव का साक्षात्कार होता है।

स्वयं के शरीर में रोम-रोंम में ईश्वर का अनुभव करना एवं प्रत्येक समयईश्वर के चिन्तन में संलग्न रहकर अपने सभी कर्म तथा परिणामों को ईश्वर को ही समर्पित करते रहने ईश्वर प्राणिधान कहलाता है। ईश्वर प्राणिधान से ईश्वर की निकटता प्राप्त होती है।

आसनः

आसन व्यायाम की वे क्रियाएं है जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों को विभिन्न आकृतियों में बदला जाता है। आसन शरीर को स्वस्थ तथा निरोग रखने का साथ-साथ विचारों एवं भावों को भी पवित्त रखते है।

प्राणायामः

श्वास लेने तथा छोड़ने की इच्छा को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम में प्राणवायु के निरोध से चित्त की चंचलता दूर हो जाती है तथा वह स्थिरता प्राप्त कर लेता है।

प्रत्याहारः

वे क्रियाएं जिनसे वहिर्मुखी इन्द्रियों को अपने-अपने विषय से विरक्त कर अन्तर्मुखी बनाया जाता है, प्रत्याहार कहलाता है। जिह्वा को रस से, नेत्रों को रूप से, त्वचा को स्पर्श से तथा नाक को गन्ध से दूर कर लेना ही प्रत्याहार है।

धारणाः

चित्त की चंचलता को दूर करने के लिए उसे शरीर के किसी एक विशेष भाग में या बाह्य प्रदेश में किसी बिन्दु पर स्थिर रखने की क्रिया या चित्त की एकाग्रता को धारणा कहा जाता है। धारणा से चित्त एक स्थान पर एकाग्र हो जाता है तथा इधर-उधर नही भटकता है। धारणा की परिपक्व अवस्था को ध्यान कहा जाता है।

ध्यानः

ध्यान दो प्रकार के होते हैः स्थूल तथा सूक्ष्म।

किसी चित्र या मूर्ति के माध्यम से ईश्वर की आराधना करना “स्थूल ध्यान” कहलाता है। स्वहृदयस्थ तेजोमय आत्मा मे ही ईश्वर का चिन्तन करना “सूक्ष्म ध्यान” कहलाता है।

समाधिः

यह योग की अन्तिम अवस्था है। जब मात्र ईश्वर की ही प्रतीति होती है, अन्य सब कुछ शून्य लगता है तो उस स्थिति को “समाधि” कहा जाता है। सम्धि वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं के अस्तित्व का भी ध्यान नही रहता। समाधि समस्त यौगिक क्रियाओं की चरम परिणिति है। चित्त शुध्दि से एकाग्रता प्राप्त होती है तथा एकाग्रता समाधि में परिति होकर ईश्वर का सामीप्य लाभ प्राप्त कराती है।

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