Yoga

बन्ध

बन्ध

बन्ध का अर्थ है कड़ा कर देना या बांध देना। हठयोग की क्रियाओं में बन्ध और मुद्रा का विशेष महत्व है। मनुष्य के शरीर में अवस्थित षट्चक्रों को खोलने तथा सुप्तावस्था में पड़ी कुण्डलिनी जागृत करनें की गुप्त विधि बन्ध तथा मुद्रा हैं जिसके कारण यौगिक क्रियाओं में इनका अत्यन्त महत्व है। मनुष्य के शरीर में गुदा के निकट मूलाधर चक्र पाया जाता है। कुण्डलिनी सुप्तावस्था में मूलाधार चक्र में पड़ी रहती है। मनुष्य के शरीर में समस्त गुप्त शक्तियो का केन्द्र कुण्डलिनी ही है जिसके जागृत हो जाने से मनुष्य सांसारिक मोह-माया के बन्धन से मुक्त हो जाता है तथा आत्मा का परमात्मा से सम्मिलन हो जाता है। बन्ध तथा मुद्रा के नियमित अभ्यास से अचेतन इच्छा शक्ति का ज्ञान प्राप्त हो जाता है जिसके प्राप्त हो जाने पर उस परम शक्ति को शरीर में प्रविष्ट कराया जा सकता है। कई प्राणायाम तथा योगासनों में भी बन्ध लगाने की आवश्यकता पड़ती है। बन्ध सदैव आसन के बाद ही किए जाते हैं परन्तु कुछ बन्ध आसनों के साथ लगाये जाते हैं। प्राणायाम के साथ बन्ध लगाने से अत्यधिक लाभ होता है तथा शक्ति में अत्यधिक बढ़ोत्तरी होती है।

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बन्ध के प्रकारः

बन्ध मुख्य रूप से 03 प्रकार के होते हैः

  1. मूल बन्ध।
  2. जालन्धर बन्ध।
  3. उड्डियान बन्ध।

मूल बन्ध, जालन्धर बन्ध तथा उड्डियान बन्ध को एक साथ लगाने की क्रिया महाबन्ध कहलाती है। मूल बन्ध सदैव जालन्धर बन्ध के साथ लगाया जाता है। जालन्धर बन्ध में कुम्भक का अत्यन्त महत्व है, कुम्भक के अभाव में जालन्धर बन्ध महत्वहीन हो जाता है। ठीक इसी तरह उड्डियान बन्ध में बहिर्कुम्भक का विशेष महत्व है तथा उड्डियान बन्ध के साथ बहिर्कुम्भक किया जाता है। बहिर्कुम्भक के बिना उड्डियान बन्ध का अभ्यास नही किया जाता है।

बन्ध लगाने की विधिः

मूल बन्धः

मूल बन्ध का अर्थ है गुदा का संकुचन। मूलबन्ध लगाने के लिए सबसे पहले सिध्दासन, पदमासन या बज्रासन में से किसी आसन में बैठ जाएं, घुटना पृथ्वी से स्पर्श करता रहे। दोनों हाथ दोनों दोनों पैर के घुटनों पर रखें एवं श्वास को अन्दर या बाहर कहीं भी रोंक कर कुम्भक करें। गुदा मार्ग को भीतर की तरफ संकुचित करें तथा दोनों कन्धों को ऊपर की तरफ तानते हुए दोनों हाथ की हथेलियों द्वारा दोनो घुटनों को दबायें और मूलाधार (विशुध्दि चक्र) में सम्पूर्ण ध्यान लगायें। मूलबन्ध लगानें की यही विधि है।

जालन्धर बन्धः

जालन्धर बन्ध का अर्थ  “श्वास नली का संकुचन” है। जालन्धर बन्ध लगाने के लिए सर्वप्रथम वज्रासन की स्थिति में तनकर इस प्रकार बैठें कि दोनों पैरों के घुटने भूमि को स्पर्श करते रहें। तदोपरान्त गहरी श्वास लेकर अन्तःकुम्भक करें तथा सिर को झुकाते हुए ठोंड़ी को गले के गट्टे में इस प्रकार टिकाकर दबाएं कि श्वास नली में संकुचन हो। विशुध्दि चक्र में ध्यान केन्द्रित करें।

उड्डियान बन्धः

उड्डियान बन्ध का अर्थ, “आंतों का संकुचन” है। पदमासन, सुखासन या बज्रासन में बैठकर मुख के द्वारा श्वास को बाहर निकाल दें, पेट के भीतर की अधिकाधिक श्वास बलात्  बाहर निकाल करके बहिर्कुम्भक करें यानी श्वास को बाहर ही रोंके रखें। इसके बाद जालन्धर बन्ध लगाते हुए पेट को यथासम्भव दबाते हुए उसे रीढ़ की हड्डी से चिपकाएं तथा मणिपुर या विशुध्दि चक्र पर ध्यान केन्द्रित करें। ध्यान रहे उड्डियान बन्ध करने से पूर्व अग्निसार क्रिया करने से अधिक लाभ मिलता है।

अग्निसार क्रियाः

खड़े होकर अथवा बज्रासन में बैठकर दोनों हाथ की हथेलियों को दोनों पैरों के घुटनों पर जमा लें, श्वास अन्दर खींचकर बाहर निकाल दें और बहिर्कुम्भक करके जालन्धर बन्ध लगाएं। पेट को जितना सम्भव हो सके भीतर की ओर दबाकर रीढ़ की हड्ड़ी चिपकाने का प्रयास करें, फिर बाहर की तरफ ढकेलें। पेट को फैलाने व सिकोड़ने की उक्त क्रिया प्रति मिनट 15 बार करते हुए दोहराएं। इसके उपरान्त बन्ध छोड़कर स्वाभाविक श्वास लें।

महाबन्धः

मूल बन्ध, जालन्धर बन्ध तथा उड्डियान बन्ध को एक साथ लगाने की क्रिया महाबन्ध कहलाती है। महाबन्ध करने के लिए सबसे पहले गहरी श्वास लेकर अन्दर की समस्त वायु को बलात् बाहर निकाल दें तथा ठोड़ी को कंठ कूप में धंसाकर श्वास यन्त्र को संकुचित करें, यथासम्भव देर तक इस स्थिति में रहें। चित्त को मूलाधार चक्र, मणिपुर चक्र व विशुध्दि चक्र में केन्द्रित करें एवं अनुभव करें कि मूलाधार चक्र पूरी तरह नियन्त्रण में हो गया है और पेट की आंते संकुचित हो गई हैं। मन को बारी-बारी उक्त तीनों चक्रों पर घुमाएं तथा यथासम्भव श्वास को रोंकें। इसके बाद क्रमशः उड्डियान बन्ध, मूलबन्ध तथा जालन्धर बन्ध खोल कर श्वास  लें। उक्त समस्त बन्धों को 5-5 बार करने से पूर्ण लाभ मिलता है।

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