Yoga

योग में मुद्रा का महत्व

योग में मुद्रा का महत्व 

मुद्रा संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है शरीर का अंग विन्यास। मुद्राएं कई प्रकार की होती है। घेरण्ड संहिता तथा प्रदीपिका में क्रमशः 25 व 10 मुद्राओं का उल्लेख मिलता है। कुछ मुद्राओं मे समस्त शरीर तथा कुछ मुद्राओं में मात्र दोनों हाथों का ही उपयोग होता है। आयुर्वेदानुसार मानव शरीर में विभिन्न रोगों की उत्पत्ति पंचतत्वों (अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी तथा जल) में से किसी एक या एक से अधिक के असन्तुलित हो जाने के कारण ही होती है अर्थात् यदि ये पंचतत्व सन्तुलित रहते हैं तो शरीर निरोग रहता है तथा कोई रोग नही होता है। इन पंचतत्वों का हाथ की विभिन्न अंगुलियो से अटूट सम्बन्ध होता है जो निम्न सारणी में प्रदर्शित किया गया है।

पंचतत्वों का हाथ की अंगुलियों से सम्बन्धः

क्रम संख्या हाथ की अंगुलियां पंचतत्व
1. अंगुष्ठ अग्नि
2. तर्जनी वायु
3. मध्यमा आकाश
4. अनामिका पृथ्वी
5. कनिष्ठिका जल

 

मुद्राओं का सम्बन्ध मानव शरीर की तन्त्रिका तन्त्र से होने के कारण मुद्राएं मानव मस्तिष्क से सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित करते हुए मस्तिष्क में अचेतन प्रक्रियाओं को प्रभावित कर आन्तरिक ऊर्जा को सही मार्ग में प्रवाहित कर शरीर के विभिन्न संवेदी अंगों, तन्त्रिकाओं आदि पर सकारात्मक प्रभाव डालती है जिसके कारण शरीर में पंचतत्व सन्तुलित रहते है तथा शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है। मुद्राओं के नियमित अभ्यास से ब्रम्हचर्य पर विजय प्राप्त होती है तथा शारीरिक व मानसिक शक्ति का विकास होता है।

किसी भी मुद्रा को करने का सही समय 10 मिनट से प्रारम्भ कर 45 मिनट तक है। वैसे तो मुद्राएं कहीं भी किसी भी समय की जा सकती हैं परन्तु सूर्योदय के पूर्व एवं एकान्त स्थल पर  पदमासन, बज्रासन या सुखासन में बैठकर मुद्रा किया जाना अत्यन्त लाभकारी होता है। इस लेख के माध्यम से कुछ अति महत्वपूर्ण मुद्राओं तथा उससे होने वाले लाभों को प्रस्तुत किया जा रहा है जिसका समुचित अध्ययन कर नियमित अभ्यास कर शरीर को पूर्णतया स्वस्थ एवं निरोग रखा जा सकता है।

ज्ञान मुद्राः

अंगुष्ठ के ऊपर तर्जनी को मिला देने से ज्ञान मुद्रा बनती है। इस मुद्रा का 45 मिनट तक प्रतिदिन नियमित अभ्यास करने से मस्तिष्क के सभी दोष, अनिद्रा, कम या अधिक नीद आना, स्मरण शक्ति की कमी, एकाग्रता का अभाव, मनोविकृति तथा क्रोध आदि दोष दूर हो जाते हैं, नकारात्मक विचार कम हो जाते हैं तथा आध्यात्मिक शक्ति विकसित होती है।

वायु मुद्राः

तर्जनी को अंगुष्ठ मूल में मिलाकर थोड़ा से दबाने से वायु मुद्रा बनती है। इस मुद्रा का 45 मिनट तक प्रतिदिन नियमित अभ्यास से मात्र दो से तीन दिन में वात रोग (गठिया, लकवा, अर्थ्राइटिस, घुटने में दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द, गर्दन में दर्द तथा गैस आदि रोग) में लाभ होता है। वात दोष से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह मुद्रा संजीवनी समान है। वात दोष से पीड़ित व्यक्तियों को इस मुद्रा का नियमित अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

शून्य मुद्राः

मध्यमा को हथेली से मिलाकर हल्का सा दबाने से शून्य मुद्रा बनती है। इस मुद्रा का 45 मिनट तक प्रतिदिन नियमित अभ्यास करने से बहरापन, कर्णस्त्राव पीड़ा, हृदय, गला, थायरायड रोग  समाप्त हो जाती है। जिन व्यक्तियों को बहरेपन की समस्या हो उनके लिए यह मुद्रा संजीवनी समान है।

लिंग मुद्राः

दोनों हाथ की हथेली को आपस में मिलाकर मुट्ठी बांध कर बायां अंगुष्ठ कुछ ऊपर रखने से लिंग मुद्रा बनती है। इस मुद्रा का 25 से 30 मिनट तक प्रतिदिन नियमित अभ्यास करने से शरीर में ऊष्मा की वृध्दि होती है, कफ दोष समाप्त हो जाता है, सर्दी, खांसी, जुकाम, अस्थमा तथा साइनस में अत्यन्त लाभकारी हैं, आन्तरिक द्वन्द्व, भय व मानसिक तनाव एवं चिन्ता से मुक्ति मिलती है तथा रक्तचाप सन्तुलित हो जाता है।

पृथ्वी मुद्राः

अनामिका को अंगुष्ठ से मिलाने से पृथ्वी मुद्रा बन जाती है। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से शारीरिक दुर्बलता नष्ट हो जाती है, विचारों की संकीर्णता समाप्त हो जाती है, वजन में कमी आती है, मोटापा दूर होता है, पाचन शक्ति बढ़ती है तथा शरीर में स्फूर्ति और चमक आती है।

सूर्य मुद्राः

अनामिका को अंगुष्ठ मूल में लगाकर हल्का सा दबाने से सूर्य मुद्रा बन जाती है। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से शरीर की स्थूलता नष्ट हो जाती है तथा शरीर चुस्त-फुर्त, ओजवान हो जाता है, वजन तथा मोटापा कम होता है, तनाव कम होता है, रक्त में कोलेस्ट्राल घटता है, डायबिटीज ठीक होता है और लीवर से जुड़ी बीमारी ठीक होती है। मोटापा से पीड़ित व्यक्तियों को इस मुद्रा का नियमित अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

वरुण मुद्राः

कनिष्ठिका को अंगुष्ठ के अग्रभाग से मिलाने से वरुण मुद्रा बनती है। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से जल तत्व की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, त्वचा का रूखापन, मुहासे ठीक होते हैं, चेहरे की सुन्दरता बढ़ती है तथा रक्त विकार आदि समाप्त हो जाते हैं। रक्त शोधित हो जाता है।

अपान मुद्राः

अंगूठे, मध्यमा तथा अनामिका के शीर्ष आन्तरिक भाग को आपस में छुवायें तथा शेष दो अंगुलियों को सीधा रखें तो अपान मुद्रा बन जाती है। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से कब्ज, डायबिडीज, बवासीर, किडनी से सम्बन्धित रोग एवं मूत्र रुकावट की समस्या ठीक हो जाते हैं, तथा पेट, हृदय व  दांत से सम्बन्धित रोगों में काफी लाभ होता है।

प्राण मुद्राः

कनिष्ठिका एवं अनामिका को अंगुष्ठ के अग्रभाग से मिलाने से प्राण मुद्रा बनती है। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है, नेत्र विकार दूर होकर नेत्र ज्योति में वृध्दि होती है, थकान दूर होती है तथा लम्बे समय तक व्रत रहने पर भूख प्यास नही लगती है। इस मुद्रा का नियमित अभ्यास सभी को करना चाहिए।

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